पिता मजदूरी कर चलाते हैं घर, बेटी कूड़ा बीनने वाले बच्चों को कर रही एजुकेट

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भागलपुर(बिहार).रोज शाम को सैंडिस कंपाउंड स्टेडियम में बना मंच स्कूल की कक्षा में तब्दील हो जाता है। मंच की दीवार पर ए, बी, सी और क, ख, ग लिखे कैलेंडर टंगे हैं। दो-तीन कतार में बैठे बच्चे-बच्चियां और सामने ट्रैकशूट पहने एक लड़की अक्षर ज्ञान दे रही है।

रोज साइकिल से आती है पढ़ाने…
पढ़ने वाले बच्चे कूड़ा बीनते हैं और पढ़ाने वाली लड़की, जिन्हें बच्चे स्वीटी दीदी कह कर पुकारते हैं, उसके पिता-भाई मजदूरी करते हैं। स्टेडियम में खेल रहे लड़कों ने बताया कि स्वीटी रोजाना यहां क्लास लगाती है। उसका घर सरमसपुर है और रोज साइकिल से यहां पढ़ाने आती है।

सबको साक्षर बनाने का जुनून
स्वीटी कहती हैं कि उनकी इच्छा सभी को साक्षर बनाने की है। सरस्वती पूजा के दिन एक पूजा स्थल पर कुछ बच्चियों को उसने कूड़ा बीनते देखा। मन में बड़ी कोफ्त हुई। क्या इन बच्चों को शिक्षा पाने का अधिकार नहीं है। बस तभी ही कूड़ा बीनने वाले इन बच्चों से बातचीत की और उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित किया और वे पढ़ने के लिए आने लगे।

शुरुआत में काफी परेशानी आई
सैंडिस कंपाउंड या उसके आसपास जो भी बच्चे कूड़ा बीनते हुए दिख जाते, उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित करती और स्टेडियम स्थित अपनी क्लास में ले आती, लेकिन अगले दिन वह बच्चे नहीं आते। फिर उसने उन बच्चों के घर जाकर उनके अभिभावकों को बार-बार समझाना शुरू किया। शुरू में मात्र 4-5 बच्चे ही आते थे, वहीं आज 50-60 हो गई है।
– सरमसपुर की स्वीटी जगा रही है बच्चों में शिक्षा की अलख
– रोज सैंडिस में लगती है क्लास, 60 से 70 बच्चे आते हैं पढ़ने
– अभिभावकों को भी बच्चों को पढ़ाने के लिए करती है जागरूक

जानिए स्वीटी को
स्वीटी अभी शारदा झुनझुनवाला कॉलेज में बीए पार्ट-3 की छात्रा है। उसके पिता आनंदी मंडल दैनिक दिहाड़ी मजदूर हैं। भाई भी मजदूरी करते हैं। दो भाई और दो बहनों में छोटी स्वीटी की पढ़ाई के प्रति ललक को देखते हुए पिता व भाई ने उसे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। वह एनसीसी गर्ल्स बटालियन में थी। एक दिन सैंडिस में ड्रिल के दौरान यहां बच्चों को खेलते देखा। उसकी भी इच्छा हुई। पैसे की कमी आड़े आ गई, लेकिन उसकी लगन को देखकर राकेट बाॅल के कोच उसे फ्री में कोचिंग देेने लगे और फिर वह इसी तरह कराटे भी सीखने लगी।

हमें दीदी के जैसा बनना है
स्वीटी की क्लास में कई बच्चे हैं। सब अलग-अलग उम्र के, लेकिन पूछने पर सभी एक स्वर में कहते हैं, हमें दीदी के जैसा बनना है। क्लास में मौजूद मोनी परवीन, रेहाना, अंगूरी, छोटी, रुखसार, सना ने बताया कि वह इस स्कूल की पहली विद्यार्थी हैं। सभी बच्चे पुलिस लाइन व उसके आसपास की झोपड़पट्टी के हैं। इन बच्चों ने बताया कि उन्हें पढ़ना अच्छा लगता है, लेकिन घर में साधन नहीं होने के कारण मजबूरी में उन्हें कूड़ा बीनने का काम करना पड़ता है। रोजाना यहां साढ़े चार बजे आती हैं।

बच्चों के लिए स्कूल खोलना चाहती है
स्वीटी की क्लास में अभी न तो ब्लैकबोर्ड है और न ही बैठने की कोई व्यवस्था। सभी बच्चे नीचे फर्श पर ही बैठते हैं। स्वीटी कहती हैं, पैसे का अभाव है। अभी तो वह अपनी ही पॉकेट मनी से यहां लगाने के लिए कैलेंडर, बच्चों को पढ़ाने के लिए किताबें आदि लेकर आती हैं। बच्चों का मन पढ़ाई में लगा रहे, इसलिए वह बीच-बीच में आइसक्रीम, चॉकलेट आदि भी खिलाती हैं। उसकी लगन को देखकर होमगार्ड ऑफिस वालों ने ब्लैकबोर्ड देने की बात कही है। उसकी इच्छा स्कूल खोलने की है।

Source: Bhaskar.com

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